धनतेस की कथा Dhantrayodashi katha in Hindi

धनतेस की कथा Dhantrayodashi katha in Hindi

क्षीरसागर में माता लक्ष्‍मी के साथ निवास करने वाले श्रीहरि के मन में विचार आया कि एक बार चलकर मृत्‍युलोक का निरीक्षण किया जाए। माता लक्ष्‍मी भी उनके साथ आने को कहने लगीं। भगवान विष्‍णु ने उनसे कहा, ‘आप मेरे साथ एक ही शर्त पर आ सकती हैं, आपको मेरे कहे अनुसार चलना होगा और मेरी सभी बातों को मानना होगा।’ मां लक्ष्‍मी भगवान विष्‍णु की बात मानकर धरती पर उनके साथ विचरण करने आ गईं।

धरती पर पहुंचने के कुछ समय पश्‍चात भगवान विष्‍णु ने मां लक्ष्‍मी को एक स्‍थान पर रोककर कहा, मैं जब तक वापस न आ जाऊं तब तक आप यहां रुककर मेरा इंतजार करें। यह कहकर विष्‍णु दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। लक्ष्‍मीजी ने उनकी बात नहीं मानी और वह भी उनके पीछे चल दीं।

कुछ दूर चलने के पश्‍चात उन्‍हें सरसों का खेत दिखाई दिया। खेत में सुंदर पीले सरसों के फूल देखकर लक्ष्‍मीजी अति प्रसन्‍न थीं। उन्‍होंने इन सरसों के फूलों से अपना श्रृंगार किया और फिर चल दीं। आगे चलने पर अब उन्‍हें गन्‍ने का खेत मिला। पके-तैयार गन्‍ने को देखकर मां लक्ष्‍मी से रहा नहीं गया और फिर वह गन्‍ने के खेत में रुककर गन्‍ना चूसने लगीं।

अपनी आज्ञा का उल्‍लंघन देखकर भगवान विष्‍णु को माता लक्ष्‍मी पर क्रोध आ गया। उन्‍होंने मां लक्ष्‍मी को शाप दिया, ‘तुमने मेरी आज्ञा का उल्‍लंघन किया है। तुमने किसान के खेत से चोरी की है। इस सब के बदले अब तुम्‍हें 12 वर्ष तक किसान के घर रहकर उसकी सेवा करनी होगी। भगवान माता लक्ष्‍मी को धरती पर छोड़कर क्षीरसागर वापस चले गए।

12 वर्षों तक मां लक्ष्‍मी ने किसान के घर में रहकर उसे धन-धान्‍य और रत्‍न-आभूषणों से भर दिया। 13 वां वर्ष लगते ही शाप पूरा हुआ और भगवान विष्‍णु मां लक्ष्‍मी को अपने साथ ले जाने वापस धरती पर पहुंचे। भगवान विष्‍णु को देखकर किसान ने लक्ष्‍मीजी को उनके साथ भेजने से इंकार कर दिया। तब विष्‍णुजी ने किसान को समझाया कि लक्ष्‍मीजी को आज तक कोई रोक नहीं सका है। वह तो चलायमान हैं। आज यहां तो कल वहां। मेरे शाप के कारण यह 12 वर्ष से आपके पास रुकी थीं, मगर अब इनके जाने का वक्‍त आ गया है। इतने पर भी किसान नहीं माना और लक्ष्‍मीजी को नहीं भेजने का हठ करने लगा।

तब लक्ष्‍मीजी को एक उपाय सूझा। उन्‍होंने कहा, मैं जैसा कहूं, आपको वैसा करना होगा। फिर लक्ष्‍मीजी ने बताया, कल तेरस है। तुम अपने घर साफ-सफाई करके उसे लीप-पोतकर स्‍वच्‍छ करना। शाम की बेला में घी के दीपक जलाकर मेरी पूजा करना। तांबे के एक कलश में सिक्‍के भरकर मेरे लिए रखना। मैं उस कलश में निवास करूंगी। फिर एक साल के लिए तुम्‍हारे घर में ही निवास करूंगी। किसान ने ऐसा ही किया और उसका घर भी धन-धान्‍य से सम्‍पन्‍न हो गया। तब से हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की तेरस को धनतेरस की तरह मनाया जाता है।

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